Saturday, November 28, 2009

निठल्लेपन का दर्शन

अरसा हो गया हमे व्यस्त हुए , वैसे तो फुरसतियों को दुनिया निठल्ला, काहिल और ना जाने क्या क्या कहती है, पर वही नाशुक्री दुनिया भूल जाती है की दुनिया में जितने भी महान दार्शनिक अब तक हुए, वो सब निठल्ले ही थे, और उनके इसी तथाकथित स्थिति जिसे दुनिया निठल्लापन कहती है में से निकले हुए विचारों को दुनिया ने बाद में दर्शन कहा .!


खैर दुनिया की शिकायत फिर कभी ... आज हम आपको अपनी ही तरह के एक महान निठल्ले श्री बेताल जी और अपनी मुलाक़ात की कथा सुनायेंगे ...!

महान दार्शनिक बनने की अनिवार्य शर्त होती है दर दर भटकना .. तो हमने भी सोचा की क्यूँ ना भटक के इस शर्त को भी पूरा किया जाये ताकि हमारे और महान दार्शनिक होने की बीच की ये बाधा भी हट जाये

बहुतेरी जगहों पे भटक के हमने सोचा जीवीत प्राणियों के सानिध्य में तो बहुत रहे पर कोई दर्शन नहीं निकला, थोडा मृतकों के करीब आयें तो कुछ नया दर्शन निकले, यही सोच शमशान पहुचे .. ..खैर नए दर्शन का तो पता नहीं पर शमशान भूमि में श्री बेताल जी मिल गए .. निठल्ले से पेड़ पे लटके हुए, अपनी शाश्वत भाव भंगिमा के साथ .. हमने सोचा दर्शन ना तो ना सही पर इंसानियत के नाते उनसे हाल समाचार पूछ लिया जाये .. परन्तु हम जैसे ही उनके करीब हाल चाल पूछने पहुचे, वो अपनी शाश्वत आदत अनुसार, लटक लिए हमारी गर्दन पे..और लगे किस्सा सुनाने .. उसी का विवरण मैं आज आपलोगों को भी दे रहा हूँ ..


अथ: श्री बेताल कथा .. आरम्भ करता हूँ कलियुगी बेताल साढ़े पचीसी कथा




3 comments:

बाबा बिहारी November 29, 2009 at 11:46 AM  

आज पता चला कि एक महान दार्शनिक बनने के लिए निठल्लेपण की कसौटी पर खुद को कसना पड़ता है|

Paridhi Jha November 29, 2009 at 11:47 AM  

bahut aakarshak rachna
asha hai ki saadhe pacheesi ki kathayen bhi jald hi sun ne milengi [:)]

Ritunjay November 29, 2009 at 2:53 PM  

bahut aacha hai , chalo issi bahane kam se kam darshnik to ban hi jayega.waise bhi tum mein darshnik hone ka sabhi lakshnan hai.

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